यायावर
हाल ही में, मैंने एक मलयालम उपन्यास का अंग्रेज़ी अनुवाद, “The Wanderer”, पढ़ा l इसे वी शिनीलाल ने लिखा है और जिसके लिए उन्हें 2022 में केरल साहित्य अकादमी पुरस्कार मिला था । इस उपन्यास का मूल मलयालम शीर्षक “संपर्क क्रांति” है और यह नायक करमचंद के अनुभवों का वर्णन करता है, जब वह ट्रेन में त्रिवेंद्रम से नयी दिल्ली तक यात्रा करता है। लेखक ने इतिहास के वास्तविक पात्रों को लेकर उन्हें अपने उपन्यास में संवाद करते हुए प्रस्तुत किया है, ताकि अपने विचारों को रोचक ढंग से रख सकें। नीचे ऐसे कुछ संवाद प्रस्तुत हैं:
पहला संवाद
यह संवाद नरेंद्र दाभोलकर (पुणे के तर्कवादी और महाराष्ट्र अंधश्रद्धा निर्मूलन समिति के संस्थापक) और उनके हत्यारे के बीच है। उपन्यास में दाभोलकर की हत्या ट्रेन में दिखाई गई है, जबकि वास्तव में उनकी हत्या पुणे में हुई थी।
“क्या तुम्हें लगता है कि तुम इस पिस्तौल से मुझे मार सकते हो?”
“तुम्हारा शरीर बुलेटप्रूफ नहीं है, है ना?”
“हा, हा, हा, तुम फिर गलत हो। जैसे तुम कोई एक व्यक्ति नहीं हो, वैसे ही मैं भी एक देह मात्र नहीं हूँ । दाभोलकर एक विचार है। विचार कभी नहीं मरते। और तुम्हारे हाथ में जो हथियार है? वह भविष्य में जंग खा जाएगा और बेकार हो जाएगा।”
“हथियार भी वैसा ही है, बुढऊ । यह कोई साधारण पिस्तौल नहीं है। इसी पिस्तौल ने महात्मा गाँधी की जान ली थी। इस दृष्टि से तुम बहुत भाग्यशाली हो।”
“मूर्ख! क्या गांधी कभी मरे? विचार एक निरंतर प्रवाह हैं। एक से दूसरे में बदलते रहते हैं, विकसित होते हैं और आगे बढ़ते हैं।”
दूसरा संवाद
यह संवाद सिद्धार्थ (बाद में बुद्ध) और शंकरन (बाद में शंकराचार्य) के बीच है:
“मैं हिमालय की तलहटी से आया हूँ।”
“तुम बहुत भाग्यशाली हो। तुम हमेशा हिमालय को देख सकते हो।”
“भाग्यशाली कैसे ? वहां तुम किसी भी दिशा में देखो, बस हिमालय ही दिखता है, जैसे सफेद कपड़े के फटे टुकड़े। और हड्डियाँ जमा देने वाली ठंड। कोई भी ऊब जाएगा।”
“अय्यो, ऐसा मत कहो। अच्छा, तुम कहाँ जा रहे हो?”
“मैं दक्षिण की ओर जा रहा हूँ। वहाँ एक जगह है जहाँ तीन समुद्र मिलते हैं और उनकी लहरें एक-दूसरे को छूती हैं। वह समुद्र जहाँ जल मोक्ष देता है और एक अद्भुत दृश्य बनता है। आह! समुद्र कितना भव्य होगा।”
“हा हा हा… ऐसा कुछ नहीं है, मित्र। वहाँ सिर्फ पानी है। उसे देखकर तुम्हें क्या मिलेगा? मैं समुद्र तट पर रहता हूँ। तुम्हें वहाँ कुछ नया नहीं मिलेगा जो मुझे अब तक नहीं मिला।”
“अच्छा, और तुम कहाँ जा रहे हो ?”
“मैं हिमालय जा रहा हूँ।”
“और फिर?”
“और कुछ नहीं। वहीं जाना मेरे जीवन का एकमात्र ध्येय है।”
“तुम्हारा नाम क्या है?”
“सिद्धार्थ।”
“तुमने यात्रा कब शुरू की?”
“ढाई हजार साल पहले। इसी यात्रा में मैं बुद्ध बना। तुम्हारा नाम क्या है?”
“शंकरन।”
उपन्यास में आगे किसी और स्थान पर एक वाक्य इस संवाद का सार प्रस्तुत करता है:
“हर यात्रा निरर्थकता को खोजने के लिए एक प्रयास है ।”
तीसरा संवाद
यह दो अनाम व्यक्तियों के बीच का संवाद है, जो एक रोचक निष्कर्ष पर समाप्त होता है:
“प्रणाली या तंत्र को बनाए रखने में क्या मदद करता है?”
“डर।”
“किस बात का डर?”
“स्वतंत्रता खोने का डर।”
“राष्ट्र को क्या बनाए रखता है?”
“पुलिस प्रशासन ।”
“नहीं, पुलिस तो सिर्फ एक साधन है।”
“डर।”
“किस बात का?”
“स्वतंत्रता खोने का डर।”
“क्या इसमें अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता भी शामिल है?”
“बिल्कुल।”
“अपनी पसंद का भोजन खाने का अधिकार?”
“निश्चित रूप से।”
“क्या इन अधिकारों के खोने का डर ही व्यक्ति को प्रणाली का पालन करने के लिए मजबूर करता है?”
“हाँ।”
“तो स्वतंत्रता का हनन कहाँ होता है?”
“जेल के भीतर।”
“तो अंतिम प्रश्न—प्रणाली या राष्ट्र को क्या बनाए रखता है?”
“जेल।”
चौथा संवाद (व्यंग्यात्मक)
एक यूरोपीय यात्री और करमचंद के बीच:
“तुम भारतीय, लोगों को जिंदा जलाने में माहिर हो, है ना? भारतीय अक्सर आग से खेलने में रूचि रखते हैं। तुमने यह चौरी चौरा की घटना में भी साबित किया।”
“सिर्फ चौरी चौरा में ही नहीं। गोधरा ट्रैन आगजनी , गुजरात दंगे 2002, सिख विरोधी दंगे 1984 और आरक्षण विरोधी तथा समर्थन आंदोलनों में भी।”
“क्या तुम्हें इसके पीछे का कारण मालूम हैं ?”
“नहीं।”
“तुम्हारे वेदों की उत्पत्ति ही अग्नि से हुई है।”
उपन्यास के कुछ और रोचक/विचित्र अंश:
“मेरी तरह की राजनीति उस समाज में कैसे सफल होगी, जो मानता है कि अश्वत्थामा फिर से प्रकट हुआ है; और जो हनुमान के लिए राष्ट्रीय राजमार्ग बनाता है।”
“पुणे की बुधवार सड़क पर कैरेल का वेश्यालय :केरलवासियों के लिए छूट। स्थापना: 1945।”
“भारतीय महिला की कमर और कूल्हे इस तरह बनाए गए हैं कि वह पानी का घड़ा रख सके। नहीं, वे बच्चे को सहजता से उठाने के लिए बने हैं। अगर ऐसा है, तो पुरुष प्रजाति चतुर है; उसने घड़े को बच्चे के आकार का बना दिया और उसे महिला को थमा दिया।”
