हवाई यात्रा ने दोहराया धरातल से जुड़ा जीवन दर्शन
जो लोग हवाई सफर करते हैं उन्हें डिजी यात्रा एप के बारे में बताने की आवश्यकता नहीं है I आपने यदि अपना अकाउंट इस ऐप में बना रखा है तो यात्रा से पहले इसमें अपना बोर्डिंग पास अपलोड किया जा सकता है जिसके बाद एयरपोर्ट पर लगे कैमरे आपके चेहरे को पहचान कर प्रवेश द्वार ऐसे खोल देते हैं कि आपको ‘खुल जा सिम सिम’ भी नहीं कहना पड़ता I जहां और लोग, जिन्होंने पहले से ऐसा नहीं किया है, लंबी कतार में खड़े होकर सुरक्षा कर्मी से अपने बोर्डिंग पास चेक करवाते हैं, वहीं डिजी यात्री धड़धड़ाते हुए वीआईपी की तरह तेजी से प्रवेश पा जाते हैं I किंतु कभी-कभी इसमें कुछ लोचा हो जाता है, जैसा कि मेरे साथ हाल ही में हुआ I
एयरपोर्ट के मुख्य प्रवेश द्वार पर कोई और यात्री नहीं था इसलिए सुरक्षा कर्मी को अपने मोबाइल फोन पर मैंने बोर्डिंग पास दिखाया और शीघ्रता से अंदर चला गया I भीतर जाकर फिर से सिक्योरिटी परीक्षण के लिए मैं कैमरे के आगे खड़ा हुआ तो आशा के विपरीत स्वतः खुलने वाला बैरियर नहीं खुला I मेरी दुविधा को देखते हुए एयरपोर्ट की एक तीस वर्षीय महिला स्टाफ सहायता के लिए मेरी तरफ आई और उसने पूछा, “क्या आप डिजी यात्रा उपयोग करते हैं ?”
मेरे हां कहने पर उसने अंदाजा लगाया कि हो सकता है कि कैमरे में कोई तकनीकी खराबी होगी इसलिए उसने मुझे बगल में लगे दूसरे कैमरे के सामने खड़े होने को कहा I किंतु समस्या का हल फिर भी नहीं निकला क्योंकि दूसरा बैरियर भी नहीं खुल रहा था I
“थोड़ा और पास आईये” I युवती के मुहं से यह सुन कर हृदय में यकायक स्टीरियोफोनिक संगीत बज उठा और मस्तिष्क में पुरानी हिंदी फिल्म, ज्वेल थीफ, का गाना चलने लगा- ‘आकर मेरे पास, कानों में मेरे चाहे जो भी कहिए, चाहे जो भी कहिए’ I गाने पर थिरकती अभिनेत्री तनूजा भी किसी विशेष प्रयत्न के बगैर ही जीवंत हो गयी I हालांकि जब मैंने दृष्टि उठाकर उस महिला की तरफ देखा तो काफी निराशा हुई क्योंकि वह बुद्ध की मूरत बनी बिल्कुल निर्विकार भाव से कैमरे की तरफ देख रही थी जो मुझे अभी भी पहचानने से मना कर रहा था I युवती का कहने का आशय यह था कि मैं कैमरे के और पास खड़ा हूं I
मैं मुंगेरीलाल के हसीन सपनों से बाहर निकला और अपने को समझाया कि कहे गए शब्दों और उनके अर्थों में कभी-कभी बहुत दूरी होती है I वर्षों पहले एक नाटक का संवाद याद आ गया- ‘आंखें वही देखती हैं जो हमारा मन देखना चाहता है और कान वही सुनते हैं जो हमारा मन सुनना चाहता है I’
समस्या को न सुलझते देखकर एक पुरुष स्टाफ भी वहां आ गया I मेरे चोर मन को लगा कि हो सकता है उसने मेरी कल्पना में नाचती तनूजा को भाँप लिया था I उसने पूछा, “क्या आपने एयरपोर्ट के मुख्य द्वार पर डिजी यात्रा चैनल का उपयोग किया था ?” मेरे ना कहने पर उसने बताया कि यही कारण था कि एयरपोर्ट के अंदर का कैमरा मुझे स्वीकार नहीं कर रहा था I
मैंने भी मजाक में उससे कहा, “क्योंकि मैने एयरपोर्ट घुसने से पहले डिजी यात्रा कैमरे का अभिवादन नहीं किया इसलिए इस अशिष्टता से वह थोड़ा नाराज लगता है I”
स्टाफ ने मेरे हास्य की चेष्टा को अनदेखा करते हुए मुझे फिर साधारण पंक्ति के रास्ते से सुरक्षा परीक्षण के लिए जाने को कहा I कतार में खड़े खड़े मैं सोच रहा था कि वे दिन दूर नहीं जब आर्टीफिशल इंटेलिजेंस भी मनुष्यों की तरह संवेदनशील हो जाएगी और मानसिक रूप से इंसानों के व्यवहार से दुखी अथवा प्रसन्न हो जाएगी I तब हमारा जीवन और सुगम होगा या जटिल ,यह कहना अभी कठिन है I
सिक्योरिटी परीक्षण के बाद फ्लाइट बोर्डिंग द्वार पर पहुंचने पर वहां काफी भीड़ थी I यद्यपि वहां का स्टाफ बार-बार आग्रह कर रहा था कि यात्रीगण बताए गए ऐ, बी, सी, अथवा डी जोन के क्रमानुसार ही कतार बनाएं और जिनके जोन की घोषणा नहीं की गई थी वह कृपया शांति से बैठकर प्रतीक्षा करें I जब इस सलाह का भी कुछ अधिक असर दिखाई ना पड़ा तो माइक पर एक और घोषणा हुई I “यात्री लोग चिंता ना करें और हड़बड़ी न दिखाएं I हम सभी यात्रियों के विमान में प्रवेश होने के बाद ही उड़ान भरेंगे I”
एयरपोर्ट पर इस तरह की घोषणा मैंने पहली बार सुनी थी जिसे सुनकर मुझे थोड़ी हंसी भी आई थी I यह तो नहीं मालूम कि उस घोषणा के पीछे उस स्टाफ की अपनी मौलिक सोच और स्वयं के विचार थे या विमान सेवा की नियमावली में अपने कर्मियों के लिए यात्रियों को ढांढस बंधाने की यह साधारण शब्दावली थी I
घोषणा के बहुत बात तक मैं सोचता रहा कि कही गई बात तो बहुत ही मामूली और सबको विदित थी किंतु फिर भी विमान में घुसने की बेचैनी सभी यात्रियों में हमेशा होती है I मजे की बात यह है कि यात्रा समाप्त होने पर विमान से बाहर निकलने के लिए भी यात्री उतनी ही हड़बड़ी दिखाते हैं I विमान रनवे पर उतरने के बाद द्वार खुलने से पहले ही अधिकतर यात्री अपने अपने स्थान पर तुरंत खड़े हो जाते हैं I विंडो सीट के लिए यात्रियों को तो ऊपर लगे सामान कक्ष के कारण गर्दन झुका कर खड़ा होना पड़ता है जो थोड़ा कष्टदायक भी है I यदि यात्री हड़बड़ी न दिखाएं तो इस कष्ट से बचा भी जा सकता है I गर्दन झुका कर खड़े होकर प्रतीक्षा करने का कोई औचित्य भी नहीं है क्योंकि जब तक विमान का द्वार खुलता नहीं है और आगे बैठे यात्री उतरते नहीं है तब तक उन्हें यूं ही खड़ा रहना पड़ेगा I कभी-कभी इसमें काफी विलंब भी होता है I
बाकी खड़े हुए यात्रियों के बीच मैं अपनी सीट पर आराम से बैठा बैठा यह मनन कर रहा था कि जीवन में अक्सर यही होता है I कहीं ना कहीं पहुंचने की दौड़ में और कुछ ना कुछ अधिक पाने की चाहत में हम अकुलाए रहते हैं I वांछित स्थल पर न पहुंचने का और अपनी प्रिय वस्तु को अंततः न पाने का दुख संभवतः उतना ना हो किंतु इस पूरे प्रकरण से जुड़ी उत्कंठा हमारी शांति को भंग करती रहती है I हम भूल जाते हैं कि भाग्य से अधिक और समय से पहले हमें कुछ प्राप्त नहीं होता है I
विमान से बाहर आते हुए भी बोर्डिंग द्वार की वह साधारण सी घोषणा मेरे कानों में गूंजती रही I ईश्वर हमें बार बार अनुभव देकर यह समझाता है कि जीवन की इस यात्रा पर हर व्यक्ति अपने गंतव्य तक पहुंचेगा अवश्य - बिना किसी विलम्ब के और ठीक अपने निर्धारित समय पर I साधारण यात्रा और जीवन यात्रा में केवल एक अंतर है - आपका कोई भी सामान गंतव्य पर आपके साथ नहीं पहुंचेगा I इसलिए हड़बड़ी और बेचैनी छोड़िये I यात्रा का पूर्ण आनंद उठाइये I

Dear Anirud
Congratulations. You have very nicely described the common experience of air travel. The Truth of Life which you've concluded your story with, is something that we keep forgetting again ang again - and (perhaps) suffer.
Anirudji Bahut sundar lekh. Behavior science ko spirituality se compare karke bahut sundar baat kahi. Jeevan yeatra me bhi thought roopi luggage ke bojh ko utar kar journey enjoy kijiye. Destiny per shanti se hi pahucha jata hai. By the way Benguluru se hamesh digi yatra karta hun. Appka experience ka dhyan rakhunga